समस्तीपुर सदर अस्पताल, जो जरूरतमंदों के लिए सहारा बनना चाहिए था, आज दिव्यांगों के लिए रिश्वत का अड्डा बन चुका है। यहां विकलांग प्रमाण पत्र बनवाना बिना पैसे दिए लगभग असंभव हो गया है। ताजा मामला मोहम्मद ओबैदुल्लाह का है, जो पिछले करीब एक साल से प्रमाण पत्र के लिए अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन आज तक उन्हें उनका हक नहीं मिला।
एनरोलमेंट नंबर: 102170000024100003125
एनरोलमेंट तिथि: 03/10/2024
पीड़ित का आरोप है कि अस्पताल के कुछ स्वास्थ्यकर्मियों ने साफ शब्दों में कहा“3000 रुपये दीजिए, तभी प्रमाण पत्र बनेगा, वरना ऐसे ही दौड़ते रहिए।यह बात सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि समस्तीपुर सदर अस्पताल की वह सच्चाई है जिसे हर दिन दर्जनों दिव्यांग झेल रहे हैं। पीड़ित जब भी अस्पताल पहुंचता है, उसे कभी सर्वर खराब, कभी डॉक्टर नहीं, तो कभी कागज अधूरा होने का बहाना बताकर लौटा दिया जाता है। अंत में इशारों–इशारों में एक ही संदेश दिया जाता है—पैसे दो, काम लो।बतौर पत्रकार हमने इस मामले में पहल करते हुए पीड़ित की डॉक्टर द्वारा जारी जांच स्लिप और एनरोलमेंट कागजात सिविल सर्जन समस्तीपुर को WhatsApp पर भेजे, साथ ही जिलाधिकारी को भी सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए, ताकि किसी स्तर पर त्वरित कार्रवाई हो सके। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने ठोस प्रमाण के बाद भी अब तक न कोई जांच हुई, न दोषियों पर कार्रवाई।जिस डॉक्टर ने पीड़ित की मेडिकल जांच की, डॉ. पीडी शर्मा, उनसे जब भी बात की गई तो हर बार एक ही जवाब मिला—दस दिन बाद हो जाएगा,आठ दिन में हो जाएगा।”
लेकिन महीनों बीत गए, प्रमाण पत्र आज भी नहीं बना। तारीख पर तारीख देने के अलावा कोई ठोस पहल नहीं दिखी।
सिविल सर्जन से संपर्क की कोशिश भी नाकाम
इस मामले में पक्ष जानने के लिए बतौर पत्रकार हमने सिविल सर्जन से सीधे संपर्क करने की कई बार कोशिश की, लेकिन दो बार उन्होंने फोन रिसीव ही नहीं किया। एक बार फोन उठा भी, तो दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई—हम “हैलो–हैलो” करते रह गए, मगर कोई जवाब नहीं मिला। यह रवैया बताता है कि अधिकारी इतने गंभीर मामले में भी जवाबदेही से बच रहे हैं।
अस्पताल के कुछ कर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि यहां विकलांग प्रमाण पत्र का पूरा सिस्टम दलालों और भ्रष्ट कर्मचारियों के कब्जे में है। जो पैसे देता है, उसका काम दो–तीन दिन में हो जाता है; जो गरीब है, वह सालों धक्के खाता रहता है।
दिव्यांगों के हक पर खुला डाका
विकलांग प्रमाण पत्र कोई मामूली कागज नहीं, बल्कि दिव्यांग के लिए जीवन का सहारा है—पेंशन और भत्ता,इलाज में सहूलियत,रोजगार और आरक्षण,सरकारी योजनाओं का लाभ,सब कुछ इसी प्रमाण पत्र पर टिका होता है। लेकिन समस्तीपुर सदर अस्पताल में इसे कमाई का जरिया बना दिया गया है। गरीब और लाचार लोगों की मजबूरी से खुलेआम खेल हो रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यह मामला मीडिया के माध्यम से सिविल सर्जन तक पहुंच चुका है, तब भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या यह सब बिना ऊपर के संरक्षण के संभव है? क्या प्रशासन जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
प्रमाण संलग्न
खबर के साथ डॉक्टर द्वारा जारी जांच स्लिप एवं एनरोलमेंट कागजात की फोटो प्रकाशित की जा रही है। ये वही दस्तावेज हैं जो बतौर पत्रकार हमने सिविल सर्जन और जिलाधिकारी को WhatsApp पर भेजे थे, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सीधे सवाल—जिनका जवाब देना होगा
क्या समस्तीपुर सदर अस्पताल में विकलांग प्रमाण पत्र की “फिक्स रेट” 3000 रुपये है?
डॉ. पीडी शर्मा सिर्फ आश्वासन देने के लिए बैठे हैं?
सिविल सर्जन को सबूत मिलने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
डीएम कार्यालय की चुप्पी किसे बचा रही है?
निगरानी विभाग इस खुले भ्रष्टाचार पर खामोश क्यों है?
जनता की मांग
रिश्वत मांगने वाले स्वास्थ्यकर्मियों पर तत्काल FIR दर्ज हो
डॉ. पीडी शर्मा की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच हो
पीड़ित को 24 घंटे के भीतर प्रमाण पत्र जारी हो
विकलांग प्रमाण पत्र प्रक्रिया की निगरानी जांच कराई जाए
सिविल सर्जन कार्यालय की जवाबदेही तय हो
अगर इस बार भी मामला दबा दिया गया, तो यह मान लिया जाएगा कि समस्तीपुर में कानून नहीं, रिश्वत का राज चलता है। दिव्यांगों की आह से कोई व्यवस्था नहीं बचती—आज नहीं तो कल, जवाब देना ही पड़ेगा।
आलम की खबर प्रशासन से मांग करता है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और पीड़ित को अविलंब न्याय दिलाया जाए।“आलम की खबर का उद्देश्य किसी की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि जनहित में सच्चाई सामने लाना है। प्रशासन का पक्ष मिलने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।